बिलासपुर 6 अगस्त 2026 : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल शादीशुदा होने के आधार पर मृत सरकारी कर्मचारी की बहन को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि बेटी या बहन की शादी उसके अपने मायके से संबंध या संभावित आश्रित होने के अधिकार को समाप्त नहीं करता। इसी के साथ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें विवाहित बहन को अनुकंपा नियुक्ति के लिए अपात्र माना गया था।
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जस्टिस संजय के. अग्रवाल की एकलपीठ ने यह फैसला बिलासपुर निवासी तारा मिश्रा और उनकी बेटी अमिता दुबे की याचिका पर सुनाया। दरअसल, तारा मिश्रा के पुत्र दुर्गेश मिश्रा जिला लोक अभियोजन अधिकारी कार्यालय में पदस्थ थे। वर्ष 2018 में सेवा के दौरान उनके निधन के बाद उनकी मां ने विवाहित बेटी अमिता दुबे के लिए अनुकंपा नियुक्ति का आवेदन दिया था। हालांकि राज्य सरकार ने 2013 की नीति का हवाला देते हुए यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि शादीशुदा बहन इस श्रेणी में पात्र नहीं है।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी महिला की वैवाहिक स्थिति को उसकी पात्रता या आश्रित होने का आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने कहा कि यह मान लेना कि शादी के बाद बेटी या बहन अपने मायके के परिवार का हिस्सा नहीं रहती, संविधान की समानता की भावना के विपरीत है।कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि शादीशुदा बेटे को परिवार का सदस्य माना जाता है, लेकिन शादीशुदा बेटी या बहन को केवल उसके वैवाहिक दर्जे के कारण अधिकारों से वंचित किया जाता है, तो यह लैंगिक भेदभाव है और संविधान के अनुच्छेद 14 एवं 15(1) का उल्लंघन है।
हाईकोर्ट ने छत्तीसगढ़ शासन की 14 जून 2013 की अनुकंपा नियुक्ति नीति की व्याख्या करते हुए कहा कि नीति में मृत कर्मचारी के माता-पिता की अनुशंसा पर “भाई या बहन” को नियुक्ति देने का प्रावधान है। इसमें कहीं भी विवाहित बहन को अलग या अपात्र नहीं बताया गया है। इसलिए नीति में प्रयुक्त “बहन” शब्द का अर्थ विवाहित और अविवाहित दोनों बहनों से है। अदालत ने 19 सितंबर 2019 को जारी शासन के आदेश को रद्द करते हुए संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता के आवेदन पर नए सिरे से विचार कर चार सप्ताह के भीतर कानून के अनुरूप निर्णय लिया जाए।
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महिलाओं के अधिकारों पर अहम न्यायिक संदेश
हाईकोर्ट का यह फैसला केवल अनुकंपा नियुक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि महिलाओं के समान अधिकारों और वैवाहिक स्थिति के आधार पर होने वाले भेदभाव के खिलाफ भी महत्वपूर्ण न्यायिक संदेश माना जा रहा है। यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल बन सकता है।


