बिलासपुर : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने हत्या के मामलों में ‘लास्ट सीन थ्योरी’ की कानूनी सीमा को स्पष्ट करते हुए एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया है। अदालत ने कहा है कि केवल इस आधार पर कि आरोपी और मृतक को घटना से पहले एक साथ देखा गया था, किसी व्यक्ति को हत्या का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। जब तक परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी श्रृंखला बिना किसी संदेह के आरोपी की ओर स्पष्ट रूप से संकेत न करे, तब तक दोषसिद्धि कायम नहीं रह सकती। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने रायपुर जिले के सिलतरा में वर्ष 2016 में हुए एक हत्या मामले में आरोपी बेनीराम उर्फ छोटू बघेल को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। अदालत ने उसके खिलाफ निचली अदालत द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को भी निरस्त कर दिया। मामले के अनुसार, 21 अप्रैल 2016 की रात सिलतरा गांव में आरोपी बेनीराम और मृतक रहमुद्दीन उर्फ मोनू को साथ बैठकर शराब पीते हुए देखा गया था। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि दोनों के बीच किसी बात को लेकर विवाद हुआ।
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जिसके बाद बेनीराम ने रहमुद्दीन को जमीन पर गिराकर पत्थर से उसके सिर पर कई वार किए, जिससे उसकी मौत हो गई। पुलिस जांच में आरोपी के कथित मेमोरेंडम के आधार पर घटना में प्रयुक्त पत्थर भी बरामद किया गया था। हालांकि मामले में किसी भी प्रत्यक्षदर्शी गवाह की मौजूदगी नहीं थी, जिससे मामला पूरी तरह परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था। सत्र न्यायालय ने वर्ष 2017 में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को हत्या का दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इसके बाद आरोपी ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान मुख्य विवाद ‘लास्ट सीन थ्योरी’ पर आधारित था। अभियोजन पक्ष ने दावा किया था कि आरोपी और मृतक को अंतिम बार साथ देखा गया था, जिससे अपराध की कड़ी जुड़ती है। लेकिन अदालत ने पाया कि जिस गवाह के बयान पर यह सिद्धांत आधारित था, वह अपने पहले के बयान से मुकर गया और होस्टाइल हो गया। इस कारण ‘लास्ट सीन’ का दावा विश्वसनीय रूप से सिद्ध नहीं हो सका।
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अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि केवल अंतिम बार साथ देखे जाने का सिद्धांत अपने आप में हत्या सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है। यदि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की श्रृंखला पूरी, सुसंगत और संदेह से परे आरोपी की संलिप्तता स्थापित नहीं करती, तो दोषसिद्धि कानूनन टिकाऊ नहीं हो सकती। हाईकोर्ट ने यह भी माना कि अभियोजन पक्ष पूरे मामले को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा है। इसलिए आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए उसे दोषमुक्त किया जाता है। यह फैसला उन मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जो पूरी तरह परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित होते हैं। अदालत ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि आपराधिक न्याय प्रणाली में संदेह का लाभ हमेशा आरोपी को मिलता है और दोष सिद्ध करने की जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष पर होती है। इस निर्णय के बाद कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ‘लास्ट सीन थ्योरी’ के आधार पर चल रहे कई मामलों में अभियोजन को अब और मजबूत साक्ष्य पेश करने की आवश्यकता होगी। केवल साथ देखे जाने का तथ्य अब हत्या के मामलों में पर्याप्त आधार नहीं माना जाएगा।


