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    Home»CHHATTISGARH»बिलासपुर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सिर्फ रिश्वत की रकम मिलने से नहीं होगा दोष साबित, मांग का सबूत जरूरी
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    बिलासपुर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सिर्फ रिश्वत की रकम मिलने से नहीं होगा दोष साबित, मांग का सबूत जरूरी

    Industrial ImpactBy Industrial ImpactJuly 14, 2026
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    बिलासपुर: छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने भ्रष्टाचार से जुड़े एक अहम प्रकरण में स्पष्ट किया है कि केवल रिश्वत की राशि बरामद हो जाने से किसी आरोपी को दोषी नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा है, अभियोजन को यह भी निर्विवाद रूप से साबित करना होगा कि आरोपी ने रिश्वत की मांग की थी। हाई कोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोषसिद्ध दो सरकारी कर्मचारियों की सजा निरस्त करते हुए उन्हें बरी कर दिया। न्यायालय का निष्कर्ष रहा कि अभियोजन पक्ष रिश्वत मांगने के आरोप को संदेह से परे प्रमाणित करने में असफल रहा। मामले की सुनवाई हाई कोर्ट के सिंगल बेंच में हुई। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि अभियोजन ने रिश्वत मांगने से जुड़ी बातचीत की ऑडियो रिकॉर्डिंग प्रस्तुत की थी, लेकिन उसे साक्ष्य के रूप में स्वीकार करने के लिए आवश्यक कानूनी औपचारिकताओं का पालन नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को वैध रूप से प्रस्तुत करने के लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के तहत प्रमाण-पत्र अनिवार्य है। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऑडियो रिकॉर्डिंग में मौजूद आवाज की पुष्टि के लिए संबंधित व्यक्तियों के वॉइस सैंपल और फॉरेंसिक जांच रिपोर्ट जैसे तकनीकी साक्ष्य भी महत्वपूर्ण होते हैं। इस मामले में जांच एजेंसी न तो शिकायतकर्ता और आरोपियों के वॉइस सैंपल प्राप्त कर सकी और न ही रिकॉर्डिंग की आवाज का वैज्ञानिक सत्यापन कराया गया।

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    इन परिस्थितियों में हाई कोर्ट ने माना कि अभियोजन आरोपों को आवश्यक कानूनी मानकों के अनुरूप सिद्ध नहीं कर पाया, इसलिए आरोपियों को दोषमुक्त किए जाने का आदेश दिया गया। अभियोजन पक्ष का आरोप है, शिकायतकर्ता, जिसकी पत्नी की सैलरी छह महीने से रुकी हुई, उससे याचिकाकर्ताओं की ओर से सैलरी जारी करने के लिए 5,000 रुपये रिश्वत के तौर पर देने को कहा था। एंटी-करप्शन ब्यूरो ACB के कहने पर शिकायतकर्ता ने आरोपियों के साथ बातचीत रिकॉर्ड की और 12 अक्टूबर 2010 को किए गए ट्रैप के दौरान, अनिल की जेब से रिश्वत के नोट बरामद किए गए। जांच अधिकारी ने माना कि न तो आरोपियों और न ही शिकायतकर्ता के वॉइस सैंपल लिए गए। अभियोजन पक्ष के गवाहों ने भी माना कि रिकॉर्ड की गई बातचीत साफ नहीं है, क्योंकि उसमें कई लोगों की आवाज़ें सुनाई दे रही थीं। कोर्ट ने यह भी पाया कि इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के संबंध में इंडियन एविडेंस एक्ट, 1872 की धारा 65-B के तहत कोई सर्टिफिकेट पेश नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा, “इंडियन एविडेंस एक्ट, 1872 की धारा 65-B के तहत सर्टिफिकेट न होने और किसी भी वॉइस सैंपल या FSL रिपोर्ट के न होने की स्थिति में, वॉइस रिकॉर्डिंग पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

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    कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोषी ठहराने के लिए रिश्वत मांगने का सबूत होना सबसे ज़रूरी है। सिर्फ रिश्वत के पैसे की बरामदगी काफी नहीं है। कोर्ट ने ‘रमेश शर्मा बनाम स्टेट’ के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले का भी ज़िक्र किया, जिसमें टेप-रिकॉर्ड की गई बातचीत को सबूत के तौर पर स्वीकार करने की शर्तों पर चर्चा की गई। इन शर्तों में बोलने वाले की आवाज़ की सही पहचान, रिकॉर्डिंग के सही होने का सबूत, उसमें कोई छेड़छाड़ न होने की पुष्टि और सबूत से जुड़ी ज़रूरतों का पालन शामिल था। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, अभियोजन पक्ष रिश्वत की मांग को साबित करने में नाकाम रहा। कोर्ट ने पाया, आवाज़ की रिकॉर्डिंग की पहचान सिर्फ़ शिकायत करने वाले के बयान के आधार पर की गई। आवाज़ के कोई सैंपल नहीं लिए गए। बातचीत में शामिल बताए जा रहे किसी दूसरे व्यक्ति को न तो गवाह के तौर पर बुलाया गया और न ही उससे पूछताछ की गई। वॉयस रिकॉर्डर के साथ छेड़छाड़ की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि ज़ब्त किए जाने से पहले वह कई दिनों तक शिकायत करने वाले के पास ही रहा था। कोर्ट ने दोषी ठहराने और सज़ा सुनाने वाला फ़ैसला रद्द कर दिया। दोनों याचिकाकर्ताओं को सभी आरोपों से बरी कर दिया।

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