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    Home»Desh - Videsh»जिला परिवहन कार्यालय में चंदन कौन डीटीओ को पता नहीं, तथाकथित पत्रकार कौन?
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    जिला परिवहन कार्यालय में चंदन कौन डीटीओ को पता नहीं, तथाकथित पत्रकार कौन?

    Industrial ImpactBy Industrial ImpactSeptember 4, 2025
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    कोरबा – जिला परिवहन कार्यालय इन दिनों खूब सुर्खियां बटोर रहा है। कार्यालय परिसर में अधिकारियों के संरक्षण से कथित ड्राइवर बनाकर चंदन को परिवहन अधिकारी के केबिन के अंदर कुर्सी टेबल लगाकर काम कराया जा रहा है जिसका वीडियो हमारे द्वारा खबर में प्रसारित किया गया था। वहीं कुछ ऐसे भी लोग कैमरे में आए हैं जो परिवहन कार्यालय के सामने अवैध रूप से दुकानों का संचालन करते हुए कथित एजेंट बनकर काम करते हैं। मृत व्यक्ति की गाड़ी का नाम ट्रांसफर सबसे ज्यादा सुर्खियों में है।

    ये सभी जानकारी सामने आने के बाद प्रभारी जिला परिवहन अधिकारी से मीडिया कर्मी द्वारा संपर्क करने पर उन्होंने अपना पक्ष नहीं रखा बल्कि शिकायत करने की सलाह दी जिसके बाद शिकायत दर्ज कराई गई है। इसके अलावा परिवहन इंस्पेक्टर और संबंधित शाखा प्रभारी विकास ठाकुर द्वारा भी अपना पक्ष नहीं रखा। पिछले कुछ दिनों से मीडिया कर्मी द्वारा जुटाए गए तथ्यों के आधार पर खबरों का प्रसारण किया गया है। लेकिन कहावत है सच कड़वा होता है।

     

    इस मामले में भी वहीं हो रहा है। 03 सितंबर 2025 को एक वेब पोर्टल में प्रभारी डी.टी.ओ. विवेक सिन्हा का एक वीडियो खबर के माध्यम से बयान सामने आया है जिसमें अधिकारी द्वारा पूर्व में प्रकाशित खबर के संदर्भ में अपना पक्ष रखते हुए बात कर रहे है। इस वीडियो में अधिकारी द्वारा कहा जा रहा रहा है कि परिवहन संबंधी कोई भी कार्य नियम के अधीन किया गया है। मृत व्यक्ति जिसकी गाड़ी का नाम ट्रांसफर किया गया है वह भी नियमों के अधीन ही किया गया है जिसमें संबंधित वाहन मालिक द्वारा किस्त अदा नहीं करने के पश्चात फाइनेंस कंपनी के द्वारा गाड़ी सीज किया गया है और फार्म 36 और फॉर्म 37 में मोटर अधिनियम के अधीन फाइनेंसर को फिर फाइनेंसर के द्वारा किसी तीसरे व्यक्ति को विक्रय किया गया है। वीडियो में चंदन के बारे में पूछताछ करने पर ऐसी कोई जानकारी नहीं मिलने की बात कही गई है।

    आपको बता दे कि पिछले महीने परिवहन आयुक्त, रायपुर को जिला परिवहन कार्यालय कोरबा में मृत व्यक्ति की गाड़ी के नाम ट्रांसफर में हुई गड़बड़ी संबंधी लिखित शिकायत दी गई थी जिसकी प्रतिलिपि जिले के कलेक्टर एवं जिला परिवहन अधिकारी को भी दिया गया है। पत्र को दिए लगभग 20 दिन से भी ज्यादा दिन हो गए लेकिन अब तक शिकायतकर्ता के पत्र पर परिवहन अधिकारी ने क्या कार्रवाई की यह सार्वजनिक नहीं हो पाया है और ना ही शिकायतकर्ता को इसकी सूचना दी जा रही है।

    इसके अलावा 29/08/2025 को परिवहन निरीक्षक अतुल तिवारी एवं उनके निजी कथित ड्राइवर चंदन के विरुद्ध जांच कर कार्रवाई करने जिला कलेक्टर एवं प्रतिलिपि जिला परिवहन अधिकारी को दी गई है जिसमें शिकायत संबंधी साक्ष्य भी होना लिखा गया है जो की जांच के समय आवश्यकता पड़ने पर प्रस्तुत करने का भी उल्लेख किया गया है जिसका भी जांच अभी तक नहीं हो पाया है और तो और वीडियो में डीटीओ द्वारा चंदन नाम के व्यक्ति के संबंध में कोई जानकारी नहीं होना बता रहे हैं। इस तरह दो-दो शिकायत पत्र परिवहन अधिकारी के समक्ष पहुंचने के पश्चात भी अब तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं हो पाई जबकि शिकायत की जांच पर सही और गलत क्या है यह स्पष्ट हो सकता है फिर भी जांच नहीं किया जा रहा है, यह बड़ा सवाल है।

    चंदन कौन डीटीओ को पता नहीं

    जिला परिवहन कार्यालय के मुखिया डीटीओ विवेक सिन्हा को चंदन कौन है ये पता नहीं है इसकी पुष्टि स्वयं परिवहन अधिकारी ने वीडियो में किया है। ऐसे में परिवहन कार्यालय में इंस्पेक्टर अतुल तिवारी के कमरे में बैठकर चंदन पिछले कई महीनों से कैसे काम कर रहा है? और चंदन किसका प्रतिनिधि है जिसे इंस्पेक्टर ने अपने केबिन में कुर्सी टेबल लगाकर कार्यालय में कार्य कराया जा रहा है? क्या चंदन को इंस्पेक्टर ने अपना सहयोगी बनाया है? क्या अब चंदन को कार्यालय के बाहर एक कथित एजेंट के दुकान में बैठाकर रजिस्टर में एंट्री कराया जा रहा है? सूत्रों की माने तो जल्द ही वीडियो वायरल होने की संभावना है।

    तथाकथित पत्रकार कौन?

    वेब पोर्टल में प्रकाशित खबर में जो लिखी गई है में किसी दूसरे की लेखनी पर सवाल करना सही तो नहीं है लेकिन कुछ बिंदु ऐसे भी सामने आए हैं जो की प्रश्न लगाने जैसा है। सबसे पहले इस खबर में तथाकथित पत्रकार जैसे शब्द का प्रयोग किया गया है जो की पूरी तरह से गलत है। तथाकथित पत्रकार कौन है? और इसका सर्टिफिकेट किसके कहने पर कौन जारी कर रहा है? इसकी पुष्टि एक बार जरूर होनी चाहिए। ओछी पत्रकारिता ना सिर्फ समाज के लिए अहित होती है, बल्कि पत्रकारिता जगत के लिए भी अशोभनीय है।

    खुफिया कैमरे से ली गई वीडियो पर सवाल उठाना गलत

    इसके अलावा छुपे कैमरे से वीडियो लेना और फिर उसके स्क्रीनशॉट को समाचार पत्र, यूट्यूब या वेबसाइट पर प्रकाशित करता है ऐसा लिखना किस हद तक सही है। यह पहली बार नहीं हुआ है कि इस तरह स्टिंग किए गए वीडियो किसी न्यूज का हिस्सा बना हो या प्रसारित किए गए हो? ऐसे वीडियो के प्रसारण पर किसी प्रकार की बाध्यता लगाई गई है? ऐसे वीडियो राष्ट्रीय स्तर के न्यूज़ चैनलों में हमने कई बार देखा है जिसे EXCLUSIVE VIDEO और खुफिया कैमरे से कैद हुई तस्वीर कहा जाता है। परिवहन निरीक्षक का तथाकथित ड्राइवर जो कमरे में बैठकर सरकारी कामकाज को कर रहा था तो क्या उसे यह कहकर वीडियो बनाना था कि आपका वीडियो बनाना है और वह ऐसे वीडियो बनाने के लिए अपनी सहमति दे देता जो खुद गलत है, सोचने वाली बात है। बल्कि चंदन का जो वीडियो हमने खबर के माध्यम से प्रसारित किया है वह वास्तव में परिवहन कार्यालय का कर्मचारी है या नहीं इसकी तहकीकात होनी चाहिए और यदि कर्मचारी नहीं है तो इस तरह एक अधिकारी के कमरे में कैसे बैठकर काम कर रहा है इस पर सवाल उठाना चाहिए।

    पत्रकार शिकायत करने पर बाध्य नही

    पत्रकार खुद शिकायतकर्ता की भूमिका में सामने आकर आरटीआई और विभागीय पत्राचार करता है, इस प्रक्रिया में दबाव बनाकर आर्थिक लाभ लेने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता ऐसा लिखना कहा तक सही है। अगर यह बात सही है तो फिर ऐसे में हर दूसरे पत्रकार के ऊपर उंगली उठाई जाएगी जो निष्पक्ष पत्रकारिता कर रहे हैं। मेरी जानकारी अनुसार एक पत्रकार न सिर्फ समाचार कवरेज करने के लिए स्वतंत्र होता है बल्कि संबंधित मामले में जिम्मेदार विभाग यदि कार्यवाही नहीं करता है तो मजबूरन शिकायत कर शासन प्रशासन हित में न्याय की गुहार भी लगा सकता है जो कि हर किसी पत्रकार और आम नागरिक का अधिकार है और इस मामले में भी ऐसा ही हो रहा है।

    मृत व्यक्ति की गाड़ी में हुए नाम ट्रांसफर को लेकर जिला परिवहन अधिकारी से सीधा सवाल है…

    1. फाइनेंस कंपनी/ बैंक द्वारा वाहन लोन राशि जमा नहीं करने पर गाड़ी को सीज करने के पहले जो प्रक्रिया फाइनेंस कंपनी को अपनाई जानी थी, वह इस मामले में अपनाई गई है या नहीं? क्या इसकी जांच की गई थी?

    2. कार के फर्स्ट ऑनर की वर्ष 2021 में मृत्यु हुई थी, वहीं लगभग 3 साल बाद नाम ट्रांसफर की प्रक्रिया की गई है जो की संदेहास्पद है। जिला परिवहन अधिकारी द्वारा नाम ट्रांसफर के पूर्व फर्स्ट ऑनर को रजिस्ट्री डाक के माध्यम से तीन बार FORM – 37 [See Rule 61 (3)] में सूचना पत्र/ नोटिस और स्मरण पत्र भेजा गया था या नहीं?

    3. कार के फर्स्ट ऑनर की मृत्यु नाम ट्रांसफर के पहले हो चुकी थी तो क्या फाइनेंस कंपनी के नाम पर नाम ट्रांसफर करने के लिए किसी सक्षम अधिकारी के आदेश/ हस्ताक्षर से इस्तिहार जारी किया गया था? क्या इस्तिहार संबंधी दस्तावेजों का अवलोकन किया गया था?
    4. क्या कार के फर्स्ट ऑनर की मृत्यु की जानकारी नाम ट्रांसफर संबंधी दस्तावेजों में उल्लेख किया गया है?

    5. कार सीज करने के पहले संबंधित पुलिस थाने को कब और किस प्रकार सूचना दी गई थी? क्या इस सूचना से जुड़े दस्तावेज नाम ट्रांसफर के समय तैयार किए गए दस्तावेज में फाइनेंस कंपनी/ बैंक द्वारा प्रस्तुत किया गया था?

    6. क्या कार के फर्स्ट ऑनर की मृत्यु हो गई है? नाम ट्रांसफर के पूर्व इसकी जानकारी परिवहन अधिकारी को थी? यदि हां तो कब और किस माध्यम से सूचना दी गई थी और क्या इस बात को नोटशीट में दर्ज किया गया था?

    7. कार का नाम ट्रांसफर करने के दौरान फर्स्ट ऑनर के परिवार के किस सदस्य को जानकारी दी गई थी? सूचना का माध्यम क्या था?

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