कोरबा: सरकार ग्रामीण और दूरस्थ इलाकों में गर्भवती महिलाओं को समय पर अस्पताल पहुंचाने के लिए 102 एंबुलेंस सेवा का दावा करती है, लेकिन कोरबा जिले के पसान क्षेत्र के बाघिनडांड़ गांव की घटना ने इस व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां प्रसव पीड़ा से तड़प रही महिला को अस्पताल पहुंचने से पहले रास्ते में पेड़ के नीचे ही प्रसव कराना पड़ा। बाद में परिजनों को करीब 2 हजार रुपये खर्च कर निजी वाहन से महिला और नवजात को अस्पताल ले जाना पड़ा। जानकारी के अनुसार, पंडरीपानी पंचायत के बांधापारा गांव की मितानिन को बाघिनडांड़ निवासी गर्भवती महिला के परिजनों ने तेज प्रसव पीड़ा की जानकारी दी। मितानिन ने तत्काल 102 एंबुलेंस को कॉल किया। एंबुलेंस गांव तक पहुंची, लेकिन महिला का घर मुख्य सड़क से करीब 400 मीटर अंदर दुर्गम रास्ते पर होने के कारण वाहन वहां तक नहीं जा सका।
मितानिन का आरोप है कि उन्होंने एंबुलेंस कर्मियों से 5 से 10 मिनट रुकने का आग्रह किया, लेकिन उन्होंने इंतजार करने से इनकार कर दिया और वहां से चले गए। मितानिन के मुताबिक, बाद में एंबुलेंस चालक के निजी नंबर पर फोन करने पर जवाब मिला कि वे वहां से निकल चुके हैं और अब वापस नहीं आ सकते, इसलिए दूसरे नंबर पर संपर्क किया जाए। इसके बाद मितानिन और परिजन महिला को पैदल ही मुख्य सड़क की ओर ले जाने लगे। इसी दौरान महिला की प्रसव पीड़ा बढ़ गई। रास्ते में ही उसे पेड़ के नीचे प्रसव कराना पड़ा। हालांकि, 102 एंबुलेंस के चालक अमर श्रीवास्तव ने मितानिन के आरोपों को गलत बताया। उनका कहना है कि महिला का घर पहाड़ के ऊपर था और रास्ता बेहद दुर्गम होने के कारण एंबुलेंस वहां तक नहीं जा सकती थी। चालक के मुताबिक, उन्होंने नाले के पास करीब डेढ़ घंटे तक इंतजार किया। इसी दौरान रायपुर से भी इमरजेंसी कॉल आने लगे, जिसके चलते उन्हें वहां से जाना पड़ा।
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मितानिन और एंबुलेंस चालक के बयानों में बड़ा विरोधाभास सामने आ रहा है। मितानिन जहां एंबुलेंस के महज 5 से 10 मिनट रुकने की बात कह रही हैं, वहीं चालक करीब डेढ़ घंटे तक इंतजार करने का दावा कर रहे हैं। ऐसे में सवाल है कि उस दिन बाघिनडांड़ में 102 एंबुलेंस वास्तव में कितनी देर रुकी थी? एंबुलेंस के चले जाने के बाद परिजनों को निजी वाहन की व्यवस्था करनी पड़ी। इसके लिए परिवार ने करीब 2 हजार रुपये अपनी जेब से खर्च किए। ग्रामीण परिवार के लिए यह रकम काफी बड़ी है।


