कोरबा – मृत व्यक्ति के नाम पर रजिस्टर्ड गाड़ी को गलत तरीके से फाइनेंस कंपनी द्वारा फिर तीसरे व्यक्ति को बेचने के मामले में दोषियों के खिलाफ कार्यवाही करने परिवहन आयुक्त से शिकायत की गई है। मामला न सिर्फ गलत तरीके से नाम ट्रांसफर का है बल्कि कथित एजेंट का कार्यालय में पदस्थ बाबू के साथ चल रहे गठजोड़ को भी उजागर कर रहा है जिसके कारण शासन को फीस के रूप में मिलने वाले राजस्व का नुकसान भी पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई है।

इस पूरे मामले में अभी भी कथित एजेंट लालू को संरक्षण देने का कार्य बाबुओं सहित जिला परिवहन अधिकारी सिन्हा द्वारा किया जा रहा है जिसके द्वारा कार्यालय के बाबू और फाइनेंस कंपनी से मिलकर फर्जीवाड़े को अंजाम दिया गया है। कोरबा परिवहन कार्यालय में यह पहला मामला नहीं है, इसके पहले भी कथित एजेंट के साथ बाबुओं की मिलीभगत और फर्जीवाड़ा उजागर हुआ है जिसमें नोट लेने वाला वीडियो खूब चर्चे में रहा है।

प्राप्त जानकारी अनुसार पिछले वर्ष एक मृत व्यक्ति के कार को फाइनेंस कंपनी द्वारा गुपचुप तरीके से अपने नाम पर दर्ज करा लिया गया जिसे बाद में तीसरे किसी व्यक्ति को बेच दी गई। इस पूरे मामले की कार्रवाई में जिला परिवहन कार्यालय कोरबा में पदस्थ शाखा प्रभारी विकास ठाकुर, प्रभारी जिला परिवहन अधिकारी विवेक सिन्हा, फाइनेंस कंपनी के मैनेजर और कथित एजेंट लालू की भूमिका सबसे ज्यादा है। इस पूरे मामले में सरकारी नियम एवं निर्देशों की खुलेआम धज्जियां बढ़ाई गई है इसके अलावा शासन को फीस के रूप में मिलने वाले राजस्व में भी ढाका डालने का कार्य किया गया है जिसकी शिकायत परिवहन आयुक्त से की गई है और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की मांग की गई है।

लालू जैसे कितने कथित एजेंट चला रहे परिवहन कार्यालय को
इस पूरे मामले में कथित एजेंट लालू का भी नाम सामने आ रहा है जिसके द्वारा दस्तावेज तैयार किया गया है। इस तरह कितने लालू परिवहन कार्यालय में अनाधिकृत तौर पर कार्य कर रहे हैं इस बात की खबर जिला परिवहन अधिकारी को कैसे नहीं हो सकती है। इतनी बड़ी संख्या में प्रतिदिन जिला परिवहन कार्यालय के अंदर एवं बाहर कथित एजेंटों का जमावड़ा लगा रहता है जिसकी पुष्टि कार्यालय में लगे सीसीटीवी फुटेज से भी की जा सकती है। इस तरह कथित एजेंटो का कार्यालय में प्रतिदिन प्रवेश करना जिला परिवहन अधिकारी की मौन स्वीकृति को भी दर्शाता है।
सिंगल विंडो में नहीं हो रहा काम
इस पूरे मामले ने सरकारी सिस्टम की पोल खोल कर रख दी है। सरकार ने अधिकांश कार्यालय को सिंगल विंडो बनाया है ताकि आम जनता को किसी भी तरह की परेशानी ना हो सके, वहीं दूसरी तरफ कथित एजेंटो के बिना कोई कार्य नहीं हो रहा है। सूत्रों की माने तो इसके पीछे की मंशा लोगों की जेब पर डाका डालना है जिसमें प्रभारी जिला परिवहन अधिकारी का खुला संरक्षण है। यही कारण है कि बाबुओं में किसी कार्यवाही का भय भी नहीं है।
सवालों से घिरा कार्यालय का यह कारनामा
मृत व्यक्ति की गाड़ी के नाम ट्रांसफर मामले में कई सवाल खड़े हो गए हैं। सबसे पहले जिस व्यक्ति की वर्ष 2021 में मृत्यु हो गई है उस व्यक्ति के नाम पर रजिस्टर्ड गाड़ी किसी फाइनेंस कंपनी के नाम पर कब और कैसे ट्रांसफर किया जा सकता है? और क्या इस मामले में शासन के सारे नियम – निर्देशों के साथ – साथ लगने वाली फीस को लिया गया है? क्या इस बात की जानकारी विभाग को थी कि वह व्यक्ति मृत हो चुका है? यदि हां तो कब और किसने जानकारी दी? इस संबंध में क्या संबंधित व्यक्ति को जिला परिवहन अधिकारी द्वारा नोटिस भेजा गया था और यदि भेजा गया था तो कितनी बार भेजा गया? और कितनी बार भेजना था? इसकी भी तहकीकात इस पूरे मामले में होनी चाहिए?
दस्तावेज की हो जांच
इस मामले से जुड़े समस्त दस्तावेज एवं फाइल को तत्काल जिला प्रशासन को अपने कब्जे में ले लेना चाहिए क्योंकि दस्तावेजों में हेर फेर किए जाने की संभावना नजर आ रही है। हालांकि दस्तावेज गायब हो जाने पर संबंधित के खिलाफ पुलिसिया कार्रवाई भी हो सकती है जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण हाल ही में आदिवासी विकास विभाग में दर्ज किया गया आपराधिक प्रकरण है।
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