रायपुर : कल तक जो कदम जंगल की खाक छानते थे और जिनके कंधों पर बंदूकें बोझ बनी हुई थीं, आज उन्हीं कदमों ने लोकतंत्र के मंदिर की सीढ़ियों को छुआ. छत्तीसगढ़ के सुकमा ज़िले के 78 आत्मसमर्पित नक्सली शुक्रवार को रायपुर पहुंचे. मौका था छत्तीसगढ़ विधानसभा की कार्यवाही को लाइव देखने का. उन नेताओं से मिलने का जो इस सदन की न सिर्फ शोभा बढ़ाते हैं कि बल्कि राज्य वर्तमान और भविष्य भी तय करते हैं. कुल मिलाकर यह न सिर्फ एक भ्रमण था, बल्कि उन लोगों के लिए एक नया अनुभव था जिन्होंने सालों तक लोकतंत्र को सिरे से नकारा था.
कोरबा में आपातकालीन सेवाओं पर संकट! 21 में से 9 डायल 112 वाहन खराब, मदद पहुंचने में देरी
मंत्री से मुलाकात और विधानसभा का अनुभव
विधानसभा पहुंचे इन पूर्व नक्सलियों ने सदन की कार्यवाही को समझा और यह जाना कि कैसे जनता के चुने हुए प्रतिनिधि उनके क्षेत्र और राज्य के लिए कानून बनाते हैं. इस दौरान इन 78 लोगों ने प्रदेश के वरिष्ठ मंत्री केदार कश्यप से मुलाकात की. दिलचस्प बात यह रही कि सुकमा के ही विधायक और पूर्व मंत्री कवासी लखमा ने भी इन लोगों से भेंट की. लखमा ने मुख्यधारा में लौटने के उनके फैसले का स्वागत किया और उन्हें बेहतर भविष्य की शुभकामनाएं दीं.
पुनर्वास नीति का असर
सरकार का कहना है कि छत्तीसगढ़ सरकार की पुनर्वास नीति के तहत अब सिर्फ हथियार डलवाना ही मकसद नहीं है, बल्कि उन्हें समाज की मुख्यधारा का हिस्सा महसूस कराना भी प्राथमिकता है. पिछले डेढ़ साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो 2500 से अधिक नक्सलियों ने सरेंडर किया है. सरकार इन्हें न केवल रहने-खाने और रोजगार की सुविधाएं दे रही है, बल्कि उन्हें ‘असली सरकार’ कैसे काम करती है, यह समझाने के लिए इस तरह के पर्यटन और शैक्षणिक दौरे भी आयोजित करा रही है.
छत्तीसगढ़ विधानसभा में बड़ी घोषणा: 25 नए सरकारी कॉलेज भवनों के लिए 1306 करोड़ का बजट पास
बदली हुई सोच की नई तस्वीर
सुकमा से आए इन सरेंडर नक्सलियों का कहना था कि विधानसभा को करीब से देखना उनके लिए आंखें खोलने वाला अनुभव रहा. जंगल में रहते हुए उन्हें लोकतंत्र के बारे में जो बातें बताई गई थीं, हकीकत उससे कोसों दूर है. अब ये लोग सरकार की योजनाओं का लाभ लेकर एक सामान्य नागरिक की तरह जीवन जीना चाहते हैं. यह दौरा इस बात का सबूत है कि गोलियों की गूँज से ज़्यादा ताकत बातचीत और संवैधानिक व्यवस्था में है.


