कोरबा – औद्योगिक नगरी कोरबा जहां बड़े-बड़े कल कारखाने एवं संयंत्र स्थापित है, जहां भारी संख्या में वाहनों का कार्य परिवहन कार्यालय में प्रतिदिन होना है ऐसे जिले में शासन ने प्रभारी परिवहन अधिकारी की पोस्टिंग की है। परिवहन अधिकारी विवेक सिन्हा दो जिले के प्रभार मिलने के कारण प्रत्येक दिन जिले में उपलब्धता नहीं होने की वजह से लोगों को काम कराने में दिक्कतें हो रही है। अधिकारी की अनुपस्थिति से बाबुओं की मनमानी चरम पर पहुंच चुकी है जिसके प्रत्यक्ष उदाहरण भी सामने आए है।
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कार्यालय में बाबुओं की अलग ही बात है। बाबू राज में सबसे आगे विकास ठाकुर है जो दिनभर अपने कामों को कराने के लिए एक असिस्टेंट बैठाकर रखते हैं। सूत्रों की माने तो कमरे के अंदर गोपनीय रूप से अलमारी के पीछे टेबल कुर्सी भी लगाई गई है। बाबू विकास ठाकुर के पास जब कोई आम आदमी काम के लिए कार्यालय पहुंचता है तो उसे बाहर इंतजार करने के लिए कहता है, साहब से मार्किंग करा कर लाओ, टी.आई. से मार्किंग कराओ कहकर पेपर वापस कर देता है। ऐसा दृश्य सभी बाबुओं के केबिन में आए दिन देखने को मिलता है, जबकि सरकार द्वारा सिंगल विंडो में काम करने का निर्देश है।
CG- जिला परिवहन अधिकारी, शाखा प्रभारी, एजेंट सहित अन्य के खिलाफ हुई शिकायत

हाल ही में हमने एक खबर का प्रकाशन किया था जिसकी शिकायत प्रदेश स्तर तक की गई है, जिसमें मृत व्यक्ति के वाहन को फर्जी तरीके से फाइनेंस कंपनी द्वारा परिवहन कार्यालय में शाखा प्रभारी विकास ठाकुर और कथित एजेंट से मिलकर किसी तीसरे व्यक्ति को विक्रय करने का मामला सामने आया था। इस पूरे मामले में विकास ठाकुर का बड़ा हाथ है जिसने नोटशीट लिखा है। तीन बार नोटिस भेजने की प्रक्रिया डीटीओ ने निभाई है जो सिर्फ खानापूर्ति तक सिमित रही, वहीं कथित एजेंट लालू भी इसमें शामिल है जिसने अपना नंबर दर्ज कर इस फर्जीवाड़े में मिले होने की पुष्टि किया है।
परिवहन कार्यालय के सरकारी काम में अनाधिकृत लोगों का दखल खुलेआम, DTO की मौन स्वीकृति?
सूत्रों की माने तो मामला सामने आने के बाद प्रभारी डीटीओ विवेक सिन्हा पूरी तरह से हरकत में आ गए और फाइल को दोबारा अवलोकन भी किया जिसमें क्या सही और क्या गलत पाया गया यह तो ना तो मीडिया के सामने लाया गया और ना ही शिकायतकर्ता को बुलाकर सच्चाई से रूबरू कराया गया। लेकिन दबे जुबान यह खबर जरूर आती रही कि सभी कार्य नियमों के तहत किए गए हैं, जो प्रक्रिया होनी थी उन प्रक्रियाओं का पालन भी किया गया है।
डीटीओ की चुप्पी ने कई सारे सवालों को जन्म दे दिया है। पहला सवाल यह है कि आखिरकार एक मृत व्यक्ति जिसकी मृत्यु वर्ष 2021 में हो गई थी उस व्यक्ति की गाड़ी को वर्ष 2024 में पहना नाम ट्रांसफर किया गया में क्या मृत होने की जानकारी फाइनेंस कंपनी द्वारा जिला परिवहन कार्यालय में अधिकारी के समक्ष दी गई थी? यदि हां तो कब और किस तरह की जानकारी उपलब्ध कराई गई थी? और यदि नहीं तो क्यों जानकारी नहीं दी गई थी? दूसरा सवाल यदि सारे नियमों का पालन करते हुए मृत व्यक्ति की गाड़ी को किसी तीसरे व्यक्ति को ट्रांसफर किया गया है तो शिकायतकर्ता को या मीडिया के सामने खुद डीटीओ सामने आकर दस्तावेज दिखाने के लिए क्यों बचना चाहते हैं। क्या जनता को यह बात समझ में नहीं आ रही है।
ये रिश्ता क्या कहलाता है
परिवहन कार्यालय में पहले भी ऐसा ही एक मामला सामने आया था जिसमें मृत व्यक्ति की गाड़ी को किसी दूसरे व्यक्ति को बेच दी गई थी जिसमें कथित एजेंट का भी नाम सामने आया था जिसके बाद तत्कालीन डीटीओ ने कथित एजेंट को कार्यालय में प्रवेश पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई थी। लेकिन इस मामले में अब तक कथित एजेंट लालू के ऊपर कोई कार्रवाई नहीं हो सकी है बल्कि पूरा विभाग लालू के शरण में नजर आ रहा है। यही कारण है कि लालू द्वारा अवैध कब्जा कर बनाया गया दुकान रात में और छुट्टी के दिन भी खुला रहता है। क्या ऐसा राज है जो इस रिश्ते को निभाने के लिए सभी को मजबूर किया हुआ है।
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प्राधिकार पत्र से होगी सेटिंग?
परिवहन कार्यालय में एक नई बात सुनने को मिल रही है कि कथित एजेंट प्राधिकार पत्र प्रस्तुत करेंगे। क्या है प्राधिकार पत्र? और किसके निर्देश पर लिया जा रहा है? यह अब तक स्पष्ट नहीं हो सका है। इसके अलावा किसी तीसरे व्यक्ति के काम को लेकर ऐसे प्राधिकार पत्र क्या राज्य सरकार ने जारी किए हैं? या केंद्र सरकार के द्वारा जारी की गई है? इसकी भी पुष्टि कहीं से नहीं हो रही है। क्या प्राधिकार पत्र की आड़ में पुराने ढर्रे को नई संजीवनी देने का कार्य प्रभारी डीटीओ के द्वारा किया जा रहा है? इस बात की पुष्टि कौन करेगा


