कोरबा – एसईसीएल प्रबंधन द्वारा भू – विस्थापितों के साथ शोषण करने का मामला लगातार सामने आ रहा हैं। कोयलांचल नगरी में भू – विस्थापितों को भूमि के बदले मिलने वाले रोजगार, मुआवजा एवं पुनर्वास की सुविधा नहीं देने का मुद्दा हर दिन देखने एवं सुनने को मिल रहे है, भूमि अधिग्रहण अधिनियम एवं पेशा एक्ट का उल्लंघन करना प्रबंधन के लिए आम बात हो गई है।

लेकिन दुख की बात है कि भू – विस्थापितो की दर्द को सुनने वाला कोई नहीं है। लोग अपने अधिकारों के लिए आवाज भी उठा रहे है लेकिन इनके आवाज को प्रशासनिक बल का उपयोग कर दबा दिया जा रहा है। एसईसीएल प्रबंधन की इस हिटलर शाही रवैए से परेशान भू – विस्थापितों को सड़क की लड़ाई लड़नी अब मजबूरी बन गई है।
ताजा मामला एसईसीएल कुसमुंडा खदान में प्रभावित हो रहे ग्राम पाली का है। इस गांव में खदान विस्तार को लेकर समस्त प्रभावित भू – विस्थापित लघु, मध्यम किसान एवं युवा ने प्रबंधन के खिलाफ आवाज उठाते हुए आज ग्राम पाली से कलेक्टर कार्यालय तक पैदल मार्च किया और कलेक्टर के नाम ज्ञापन सौंपा है। भू – विस्थापितों ने ज्ञापन के माध्यम से पांच दिवस के भीतर प्रशासन एवं प्रबंधन द्वारा बातचीत हेतु सकारात्मक कदम उठाने मांग किया है और नहीं उठाए जाने पर उच्च न्यायालय की शरण में जाने एवं सत्याग्रह करने विवश होने की बात कही है जिसकी समस्त जवाबदारी SECL प्रबंधन और जिला प्रशासन की होगी।

भू – विस्थापितों ने SECL प्रबंधन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि प्रबंधन द्वारा भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 एवं पेशा कानून का खुला उल्लंघन कर रहे हैं साथ ही छोटे किसानों के अधिकारों का भी हनन कर रहे हैं जिसके संरक्षण हेतु वैधानिक मांग कर रहे हैं। SECL प्रबंधन की हिटलर शाही रवैया को देखते हुए अपनी मांगों को लेकर अब सड़क की लड़ाई लड़ने को तैयार हो गए हैं।

ये हैं मुख्य मांगे…
1. यह कि हमारा ग्राम पाली पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आता है, पेशा अधिनियम 1996 के अनुसार ग्राम सभा की स्पष्ट लिखित सहमति के बिना किसी भी अधिग्रहण या बेदखली की कार्रवाई पूर्णतः असंवैधानिक और शून्य है।
2. SECL की वर्तमान आर एंड आर नीति तथा भूमि अधिग्रहण पुनर्वास और पुनर्विस्थापन में उचित प्रतिकार और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम 2013 के प्रावधानों के अनुसार जिन परिवारों की संपूर्ण संपत्ति खेत, मकान, बाड़ी अधिग्रहित हो रही है, वह विस्थापित परिवार PAF की श्रेणी में आते हैं, उन्हें प्राथमिकता के आधार पर स्थाई रोजगार और वर्तमान बाजार दर पर मुआवजे का अधिकार प्राप्त है।
3. केवल बड़े किसानों को लाभ पहुंचाना और छोटे किसानों की अनदेखी करना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 का सीधा उल्लंघन है। हम छोटे किसान भी उतना ही प्राथमिकता और सम्मान के हकदार है।
4. भारी पुलिस बल का प्रयोग करके दबावपूर्वक बिना पुनर्वास योजना, उचित मुआवजा और बिना नियुक्ति पत्र के जमीन/ कृषि भूमि पर कब्जा/ समतली करण करना माननीय सर्वोच्च न्यायालय के दिशा निर्देशों एवं मानवाधिकारों के विरुद्ध है।
5. भारी पुलिस बल का प्रयोग कर गरीब और मध्यम वर्गीय किसानों को उनके पुश्तैनी जमीन से बेदखल करना अनुच्छेद – 21 (जीवन का अधिकार) एवं अनुच्छेद 300 A (संपत्ति का अधिकार) का हनन है। प्रशासन का विकास का तर्क किसी नागरिक की उनकी पुस्तैनी संपत्ति से दबाव पूर्वक और जोर जबरदस्ती से बेघर और बेदखल करने का अधिकार नहीं देता।
6. आपके अधिनस्थ कर्मचारी द्वारा यह कहना कि कोयला खनन हेतु ग्राम सभा की अनुमति अनिवार्य नहीं माननीय उच्चतम न्यायालय के नियमगिरी (2013) और समता (1997) फैसला की सीधी अवहेलना है जिसमें न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि ग्राम सभा ही अपनी जमीन की मालिक है।
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भू – विस्थापितों ने पत्र के माध्यम से यह भी बताया है कि संविधान के अनुच्छेद 244 ए और पेसा एक्ट की धारा 4 (1) का पांचवी अनुसूची क्षेत्र जिला कोरबा उल्लंघन किया जा सकता है। इसलिए हमारी मांग है कि अधिग्रहण की कार्रवाई को तब तक स्थगित रखा जाए जब तक की ग्राम सभा की वैध सहमति और प्रभावित लघु किसानों के साथ लिखित समझौता नहीं हो जाता तथा प्रभावित युवा को स्थाई रोजगार और बाजार दर के अनुरूप मुआवजे का स्पष्ट आश्वासन दिया जाए।
यदि इस पत्र की प्राप्ति के 5 दिवस के भीतर प्रशासन और प्रबंधन द्वारा वार्ता हेतु सकारात्मक कदम नहीं उठाए गए तो हम संवैधानिक रूप से उच्च न्यायालय / सर्वोच्च न्यायालय में रीट याचिका दायर करने और लोकतांत्रिक सत्याग्रह करने के लिए विवश होंगे जिसकी समस्त नैतिक एवं कानूनी जिम्मेदारी SECL प्रबंधन और जिला प्रशासन की होगी।


