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    Home»CHHATTISGARH»कोरबा जिले में 27.51 लाख मीट्रिक टन धान खरीदी के बाद भी उठाव सुस्त, समितियों की बढ़ी चिंता
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    कोरबा जिले में 27.51 लाख मीट्रिक टन धान खरीदी के बाद भी उठाव सुस्त, समितियों की बढ़ी चिंता

    Industrial ImpactBy Industrial ImpactFebruary 11, 2026
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    कोरबा : अंतिम रूप से दो दिन के लिए किसानों को अपनी धान बेचने के लिए मौका देने के बाद खरीदी सीजन 2025-26 अंतिम रूप से खत्म हो गया है। इधर कोरबा जिले में अधिकांश दूरस्थ केंद्रों सहित अन्य उपार्जन केंद्रों में धान का उठाव काफी कमजोर है। इस वजह से समितियां परेशान हैं। कहा जा रहा है कि राइस मिलर्स के आगे मार्कफेड लाचार बना हुआ है। कोरबा जिले की 49 समितियों के अंतर्गत 65 उपार्जन केंद्रों में खरीफ की मुख्य फसल धान की पैदावार बेचने के लिए 52 हजार 500 किसानों ने अपना पंजीकरण कराया था। 16 हजार 900 के आसपास किसानों की संख्या अंतिम रूप से भी अपने उत्पाद का विक्रय करने में नाकाम रही।

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    रकबा कटौती से लेकर गिरदावली, टोकन में मुश्किल और दूसरी समस्याओं के चक्कर में जिले का प्रत्येक किसान सरकारी घोषित समर्थन मूल्य पर धान बेचने में सफल नहीं हो सका। खबर के अनुसार सरकार ने कोरबा जिले के लिए इस वर्ष 31 लाख मीट्रिक टन धान खरीदी का लक्ष्य दिया था। यद्यपि 15 नवंबर से धान की खरीदी की घोषणा की गई लेकिन कोरबा जिले के अनेक केंद्रों में यह काम 4-5 दिनों बाद शुरू हो सका। इस अवधि में किसानों की बड़ी संख्या को काफी मेहनत के बाद फसल बेचने का अवसर प्राप्त हुआ। 31 जनवरी को धान खरीदी की अंतिम तारीख थी। कई प्रकार के दबाव और समस्याओं को देखते हुए सरकार ने फरवरी में 4 और 5 तारीख को किसानों को मौका दिया। खबर के अनुसार कोरबा जिले में अंतिम रूप से 27 लाख 51 हजार मीट्रिक टन धान का उपार्जन सकल रूप से किया जा सका।

    65 केंद्रों में किसानों से उपार्जित धान की मात्रा के उठाव की गति संतोषजनक नहीं है। कुछ ही केंद्रों में 60 प्रतिशत तक धान की खरीदी हुई है जबकि बहुत सारे केंद्रों में स्थिति लचर है। श्यांग, बरपाली, मोरगा, सिरमिना, कोरबी और ऐसे कई केंद्र हैं जहां 30 हजार या इससे अधिक क्विंटल धान का उठाव होना बाकी है। बताया गया कि डीएमओ कार्यालय से डीओ तो जारी किए गए हैं लेकिन मिलर्स उदासीन बना हुआ है। सूखत की भरपाई कौन करेगा ।

    बीते कुछ वर्षों से जिले में धान खरीदी का काम बेहतर रूप से जारी है और जीरो शार्टेज के रिकार्ड बन रहे हैं। जानकारों का कहना है कि एक निश्चित अवधि तक धान का स्टॉक होने पर उसमें सूखत की समस्या होती है। बाद में जब इसका उठाव होता है और आगे तक पहुंच होती है तब तय मात्रा में कमी की शिकायत आती है। समितियों कहा कहना है कि सिस्टम के कारण कमी होगी तो भरपाई कौन करेगा।

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    हाथी प्रभावित क्षेत्रों पर प्रशासन का फोकस, इधर उपेक्षा
    धान खरीदी का कार्य शुरु होने से ठीक पहले जिला प्रशासन की ओर से त्रिस्तरीय व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों और उनके सहायकों की बैठक लेकर आवश्यक चर्चा की गई। पूरे मामले में इस बात पर फोकस किया गया कि पारदर्शिता के साथ काम को किया जाए। विशेष रूप से जिले के उन क्षेत्रों में निगरानी के साथ धान खरीदी के पश्चात् साथ-साथ उठाव कराना सुनिश्चित हो, जो हाथी प्रभावित समस्या से जूझ रहे हैं। इनमें लेमरू, श्यांग, मोरगा, सिरमिना और कुदमुरा का इलाका शामिल है। इन क्षेत्रों में बार-बार धान की बची मात्रा के उठाव के लिए मार्कफेड को मौखिक जानकारी दी गई और पत्राचार भी किया गया लेकिन कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। एक तरह से यह प्रशासन के निर्देशों को ठेंगा दिखाने की कोशिश है। वर्तमान में मोरगा क्षेत्र में एक दंतैल की सक्रियता बढ़ी हुई है। संभावित आशंका ने धान खरीदी समिति को भयभीत कर रखा है। उसने संबंधित अधिकारियों को अवगत कराया है।

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