सक्ती – जिले में हुए फर्जी केसीसी लोन की शिकायत की जांच पर फिर से सवाल उठने लगा है। जांच अधिकारी नारायण सोनी अब अपने पद एवं अधिकार का दुरुपयोग करते हुए नजर आ रहे हैं। यही कारण है कि EOW जैसी बड़ी जांच एजेंसी में हुए शिकायत की जांच को पिछले 6 महीने से प्रभावित कर रहे हैं।
लेकिन जांच अधिकारी इस बात को भूल गए हैं कि अगर मामला उच्च न्यायालय में चली जाती है तो जवाब उनको ही देना पड़ेगा और जवाब संतोष जनक नहीं होने पर उनके खिलाफ कार्यवाही भी हो सकती है। मगर माया के खेल ने जांच अधिकारी को इस कदर प्रभावित कर दिया है कि वे अपनी जिम्मेदारी भूल गए हैं।
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देवरघटा, कलमा, बड़े कटेकोनी और बघौद समिति के विरुद्ध हुई है शिकायत
आपको बता दें सक्ती जिले के सेवा सहकारी समिति देवरघटा, कलमा, बड़े कटेकोनी और बघौद में हुए फर्जी केसीसी लोन की जांच करने EOW में शिकायत की गई थी जिसकी जांच करने के लिए सीईओ नारायण सोनी को जिम्मेदारी सौंपी गई है। लेकिन जांच अधिकारी की स्वेच्छा चारिता से प्रदेश की सुशासन सरकार की छवि खराब होने लगी है।
शिकायतकर्ता से 6 महीने पूर्व ले लिया गया है बयान
बताया जा रहा है की जांच अधिकारी नारायण सोनी द्वारा शिकायतकर्ता से 6 महीने पहले ही बयान ले लिया गया है जिसमें शिकायतकर्ता ने बयान देते समय दस्तावेज भी दिए है जो कि उनके शिकायत को सही भी बता रहा है जिसकी पुष्टि स्वयं जांच अधिकारी ने किया था और तत्काल जांच करते हुए कार्यवाही करने का आश्वासन भी दिया था।
6 महीने बाद भी कोई कार्यवाही नहीं हुई
लेकिन आज 6 महीने बीत जाने के बाद भी दस्तावेजीय प्रमाण होने के बावजूद दोषियों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हो सकी। ऐसे में जांच अधिकारियों एवं उनके उच्चाधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। सवाल उठना लाजिमी भी है क्योंकि शिकायतकर्ता का बयान लेने के लिए जांच अधिकारी ने तत्परता तो दिखाई लेकिन जिनके विरुद्ध शिकायत हुई है उनके खिलाफ आज तक ना तो कोई कार्रवाई हुई है और ना हीं उनका बयान दर्ज किया गया है।
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जांच अधिकारी को किसका मिल रहा संरक्षण?
सूत्रों की माने तो जांच अधिकारी को उच्चाधिकारियों का संरक्षण प्राप्त है। संरक्षण देने वाले अधिकारियों में जिले के नोडल अधिकारी से लेकर DRCS एवं JRCS सभी की मिली भगत बताई जा रही है। यदि आरोप गलत है तो फिर जांच अधिकारी के खिलाफ अब तक विभागीय कार्रवाई क्यों नहीं हुई? यदि अधिकारियों का संरक्षण नहीं है तो ऐसे जांच अधिकारी जो अपने कर्तव्यों को भूलकर दोषियों को बचाने सुशासन सरकार को ही कटघरे में खड़े होने को मजबूर कर रहे हैं के खिलाफ तत्काल कार्रवाई होनी चाहिए थी जो अब तक क्यों नहीं हुई यह बड़ा सवाल है?
सूत्रों की माने तो वर्तमान में जिले में ARCS के पद पर पदस्थ अधिकारी की सेवानिवृत्ति इसी महीने के अंत में होनी है। ऐसे में क्या अधिकारी द्वारा अपनी सेवानिवृत्ति को देखते हुए इस मामले से दूरी बना रहे है? यदि नहीं तो फिर अधिकारी के निर्देशों का उनके मातहत टीम द्वारा पालन क्यों नहीं किया जा रहा है? क्या इसमें भी माया का खेल चल रहा है? बड़ा सवाल है।
शिकायतकर्ता ने कहा है कि न्याय पाने एवं भ्रष्टाचार्यों के खिलाफ कार्रवाई करने जल्द ही उच्च न्यायालय याचिका लगाई जाएगी जिसमें जांच अधिकारियों को भी भ्रष्टाचारियों को बचाने के आरोप में उनका भी नाम शामिल करते हुए कार्रवाई करने का उल्लेख किया जाएगा।


